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September 24, 2012 · 1 min read

रात के पिछले पहर

Poetry

रात के पिछले पहर रोज़ वही ख्वाब सताता है
न जाने कौन सी दुनिया की सैर कराता है
सुबह होते होते जब किसी तरह होश आता है
एक कदम भी क्या ख़ाक चला जाता है

© सुधीर रायकर
रात के पिछले पहर